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ममता ने संभाली बंगाल की सत्ता

२० मई २०११

बदलाव की लहर पर सवार होकर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर शुक्रवार को सत्ता तो संभाल ली है. उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है.

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तस्वीर: DW

शुक्रवार को कोलकाता के राजभवन में आयोजित एक भव्य समारोह में ममता बनर्जी ने ठीक दोपहर एक बजकर एक मिनट पर राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री के तौर पर पद और गोपनीयता की शपथ ली. राज्यपाल एमके नारायणन ने उन्हें शपथ दिलाई. उनके साथ एक 43 सदस्यीय मंत्रिमंडल ने भी शपथ ली, इनमें से 36 तृणमूल कांग्रेस और सात कांग्रेस के हैं. शपथ ग्रहण समारोह में समाज के विभिन्न तबके के 3,200 लोगों को न्योता दिया गया. इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, वाममोर्चे के अध्यक्ष विमान बसु और कई पूर्व मंत्रियों के अलावा तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और समाज के विभिन्न तबके के लोग मौजूद थे. समारोह में एशिया की सबसे बड़ी देह व्यापार मंडी सोनागाछी की यौनकर्मियों और सिंगुर और नंदीग्राम में राजनीतिक हिंसा के शिकार लोगों के परिजनों को भी बुलाया गया था.

शपथ ग्रहण समारोह के बाद ममता अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ राजभवन से पैदल चल कर लगभग आठ सौ मीटर दूर स्थित राज्य सचिवालय राइटर्स बिलिडंग पहुंची और अपना कार्यभार संभाला. बाद में उन्होंने मंत्रिमंडल की पहली बैठक भी की. ममता को देखने के लिए राजभवन से राज्य सचिवालय तक सड़क के दोनों किनारों पर लोगों की भारी भीड़ थी.

चुनौतियों की लंबी लिस्ट:

संघर्ष से सत्ता के शिखर तक पहुंची ममता बनर्जी के सामने चुनौतियों की सूची काफी लंबी है. इनमें राज्य की कानून व व्यवस्था की स्थिति सुधारने के अलावा कर्ज से कराहते बंगाल को इस हालत से उबारना, सरकारी कर्मचारियों में कार्य संस्कृति बहाल करना, उत्तर में सिर उठाते अलगाववादियों और दक्षिण में मजबूत हो चुके माओवादियों से निपटना शामिल है. ममता की सबसे प्रमुख चुनौती राज्य में चुनावी नतीजों के बाद जारी हिंसा पर काबू पा कर हालात को सामान्य बनाए रखने की है. राज्य में हिंसा और हथियारों की बरामदगी का सिलसिला जारी है.

Mamta Banerjee
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बंगाल इस समय लगभग दो लाख करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ तले दबा हांफ रहा है. ममता को विरासत में मिला खजाना खाली है. कर्ज के इस बोझ को कम करने के लिए राजस्व बढ़ाने और इसके लिए नए कर लगाने जैसे कुछ कड़वे फैसले लेने पड़ सकते हैं जो ममता के स्वभाव के प्रतिकूल हैं. ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इस समस्या से कैसे निपटती हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने केंद्र की ओर से राज्य को हरसंभव सहायता देने का भरोसा जरूर दिया है. लेकिन उनका भरोसा बंगाल को दिवालिएपन की कगार से लौटाने में कितना कारगर होगा, इसका खुलासा आने वाले दिनों में होगा.

ममता के सामने जनता से किए गए अपने वादों पर खरा उतरने की भी गंभीर चुनौती है. उन्होंने सत्ता में आने पर तीन महीनों के भीतर दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलगाववादी आंदोलन की समस्या के समाधान का वादा किया था. इसके अलावा उन्होंने दक्षिण बंगाल के विभिन्न इलाकों में माओवादियों के मददगार होने के झूठे आरोपों में जेल की चक्की पीस रहे बेकसूरों को रिहा करने का भी एलान किया था. दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने इलाके की तीनों विधानसभा सीटें जीतकर यह साबित कर दिया है कि उसे आम लोगों का समर्थन हासिल है.

माओवाद से कैसे निपटेंगी:

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विपक्ष में रहते ममता दक्षिण बंगाल में माओवादियों के खिलाफ केंद्रीय सुरक्षा बलों की ओर से चलाए जा रहे साझा अभियान की धुर विरोधी रही हैं. अब सत्ता में आने के बाद उनके सामने दिनों-दिन जटिल होती जा रही माओवाद की इस समस्या से निपटने की कड़ी चुनौती है. यहां उनकी अगुवाई वाली सरकार में कांग्रेस शामिल है और केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार में उनकी पार्टी यानी तृणमूल कांग्रेस. ऐसे में साझा अभियान के मुद्दे पर उनका पुराना रुख दोनों दलों के बीच समस्याएं खड़ी कर सकता है.

ममता ने पुलिस प्रशासन को बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के काम करने की खुली छूट देने की भी बात कही है. लेकिन कुछ दिनों पहले तक वे आरोप लगाती रही थीं कि पुलिस प्रशासन का एक गुट माकपा के रंग में रंग गया है और कई अधिकारी काडर के तौर पर काम कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या वे पुलिस प्रशासन में बड़े पैमाने पर उलटफेर करते हुए उसे अपने अनुकूल सजाएंगी या फिर सबकुछ जस का तस ही चलता रहेगा.

काम काज की संस्कृति बहाल करना:

राज्य में कार्य की संस्कृति बहाल करना भी नई मुख्यमंत्री के लिए एक कड़ी चुनौती होगी. राज्य सरकारी कर्मचारियों की बड़ी तादाद माकपा से संबद्ध कोआर्डिनेशन कमिटी से जुड़ी है. पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सत्ता संभालने के बाद डू इट नाऊ का नारा दिया था. लेकिन इन कर्मचारियों ने उनके इस नारे की हवा निकाल दी थी. थक-हार कर बुद्धदेव ने भी चुप्पी साध ली थी. अब अहम सवाल यह है कि जो काम बुद्धदेव नहीं कर सके, क्या ममता वह करने में कामयाब होगीं. चुनौतियों की सूची में कार्यसंस्कृति का स्थान भले कुछ नीचे हो लेकिन नई सरकार की तमाम योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिहाज से तो इसकी अहमियत सबसे ज्यादा है.

यहां राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता को जल्दी ही प्राथमिकता के आधार चुनौतियों से निपटने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी. पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता को अब अपने व्यक्तितत्व और रवैये में भी बदलाव लाना होगा. कल तक वे प्रमुख विपक्षी पार्टी की नेता के तौर पर सत्तारुढ़ वाममोर्चा के खिलाफ आंदोलन का नारा बुलंद करती रहीं थीं. अब बदली भूमिका में उनके पास सरकार की कमान है. ऐसे में उन तमाम गलतियों को सुधारने की जिम्मेदारी भी उनके पास आ गई है जिनके लिए वे माकपा की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ आंदोलन का परचम लहराती रहती थी. अब सरकार की मुखिया होने के बाद उनकी राह आसान नहीं होगी. वामपंथी शासन बदलने के बाद उनके कंधों पर आम लोगों की उम्मीदों का भारी बोझ है खुद ममता भी यह बात जानती हैं.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: ओ सिंह

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