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फारसी गलीचों तक पहुंची बदलाव की बयार

८ दिसम्बर २०११

करघे पर रंगीन रेशमी धागों में उलझती जाहरा नजीर की उंगलियां एक नरम गलीचा बुन रही हैं, एक कालीन साल भर में तैयार होती है. पर तमाशा लूट रही हैं चीन और पाकिस्तान में मशीनों पर बनती इनकी नकलें.

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तस्वीर: dpa

इस्फाहान का ये इलाका अब ईरान में है. यहां 2500 से भी ज्यादा सालों से फारसी अंदाज के कालीनों को बुनने का काम चला आ रहा है. यहां आज भी सदियों पुराने करघों पर हाथ से काम होता है और कड़ी मेहनत और लगन से तैयार होती हैं वो कालीनें जो पूरी दुनिया में अपनी बेहतरीन कारीगरी, सुखद स्पर्श के लिए विख्यात हैं.

यहां फिलहाल दो लाख से भी ज्यादा बुनकरों के नाम दर्ज हैं. इन लोगों में नजीर के मां-बाप और दूसरे रिश्तेदार भी शामिल हैं. नजीर बताती हैं कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक यह काम पहुंचता रहता है और नए लोग इससे जुड़ते रहते हैं. नजीर कहती हैं, "मैं जब 15 साल की थी तभी से बुनाई शुरू कर दी. मुझे कालीन बुनना पसंद है और अगर आप बहुत ज्यादा बुनाई न करें तो इससे नुकसान नहीं होता." छोटे छोटे घरों में 10-15 लोग गलीचे बुनते रहते हैं इस बात से बेखबर की बाजार चीन और पाकिस्तान की मशीनों पर बुने गलीचों से अटा पड़ा है. ईरान में हाथ से बुने एक एक गलीचे की कई कई लाख रुपये तक होती है.

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तस्वीर: picture alliance/dpa

मशीनी कारीगर ईरानी गलीचों की डिजाइन की कॉपी करके जल्दी कृत्रिम धागों से उन्हें बुन देते हैं और फिर यह गलीचे कुछ हजार रुपये में ही बिक जाते हैं. रेशम की बढ़ती कीमत भी गलीचों की कीमत में फर्क की एक बड़ी वजह है. नजीर जैसे कारीगरों को एक दिन का मेहनताना मुश्किल से 50 रुपये तक होता है. आसमान छूती कीमतों के बावजूद ईरानी गलीचों के कारोबारियों का मुनाफा कम होता जा रहा है. पुराने बाजारों में बैठे इन व्यापारियों को ग्राहकों के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है.

इस्फाहान शहर में कालीन बेचने वाले हसन होसैनजादेह कहते हैं, "पिछले कुछ सालों में बाजार की स्थिति बेहद खराब हुई है. खरीदार कम हो रहे हैं खासतौर से इसलिए भी क्योंकि ज्यादातर तो सैलानी ही हमारी कालीनें खरीदते हैं. हमें ज्यादा सैलानियों की जरूरत है."

गिरते बाजार को देख कालीन के कुछ कारोबारियों ने कंप्यूटर और मशीनों को अपनाना शुरू कर दिया है जिससे कि बाजार पर पकड़ बनाए रख सके. कौम शहर की एक कंपनी में कालीन डिजाइन करने वाले जावाद देजाहानी के सामने कंप्यूटर रखा है. कंप्यूटर का संबंध ड्राइंग टेबल से है. वह इस उपकरण का इस्तेमाल कर डिजाइन बनाते हैं और फिर उसे महिला कारीगरों को समझाते हैं. आड़ी तिरछी धारियां, बेल बूटे, फूल पत्तियां डिजाइनों का खाका इसी मशीन पर तैयार हो रहा है. उनके बगल में एक पुराने कारीगर भी हैं जो कागज और कलम ले कर उसी पुराने तरीके से डिजाइन बना रहे हैं. देहाजानी कहते हैं, "कुछ लोग सालों से डिजाइन बना रहे हैं और अभी भी हाथ से ही काम करते हैं. 60 के दशक में यह खूब होता था तब लोगों को कंप्यूटर में दिलचस्पी नहीं थी लेकिन आखिर क्यों, जब विज्ञान की मदद मिल सकती है तो क्यों न लें, नहीं लेंगे तो अकेले पड़ जाएंगे."

सिर्फ कालीन के डिजाइन तैयार करने में ही नहीं धागों की रंगाई के तौर तरीकों में भी बदलाव आया है. रंगाई के लिए भी आधुनिक और स्वचालित मशीनें आ गई हैं जिनमें ज्यादा मेहनत और जोखिम नहीं होता. पुराने तरीके भी चल रहे हैं लेकिन ज्यादातर लोग बदलाव के पक्ष में हैं. घर की जगह फैक्ट्रियां ले रही हैं. कौम और इस्फाहान दोनों जिंदा हैं लेकिन दोनों के बीच काम के तरीके का फर्क साफ देखा जा सकता है.

इस्फाहान की आर्ट यूनिवर्सिटी में छात्र नई तकनीक कुछ ही दिनों में सीख ले रहे हैं जबकि कालीन बुनाई की पुरानी कला सीखने में महीनों लगते थे. पारंपरिक कला को सिखाने के तरीके में भी बदलाव आया है. पुराने वर्कशॉप अब क्लासरूम की शक्ल ले रहे हैं और इस तरह से सिखाई गई कला लोगों को जल्दी हुनरमंद बना रही है.

रिपोर्टः एएफपी/एन रंजन

संपादनः ओ सिंह